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देवभूमि उत्तराखंड में आज भी मौजूद हैं पांडवों के ये साक्ष्य (Evidences of Pandavas still exist in Devbhoomi Uttarakhand)

देवभूमि उत्तराखंड में आज भी मौजूद हैं पांडवों के ये साक्ष्य (Evidences of Pandavas still exist in Devbhoomi Uttarakhand)



शिव के बारह ज्योतिर्लिंग में से एक केदारनाथ धाम, हिमालय की वादियों में स्थित है, माना जाता है की  केदारनाथ मंदिर का निर्माण प्राचीन काल में पांडवों द्वारा ब्रह्म हत्या, भ्रात हत्या जैसे पाप से मुक्ति पाने के लिए किया गया था, बाद में मालवा के राजा भोज ने भी मंदिर निर्माण सम्बन्घित कुछ कार्य करवाए थे , जबकि अघिकतर लोगो का मानना है की 8 वीं शताब्दी में आदिशंकराचार्य ने मंदिर का आज का मौजूदा स्वरूप बनवाया था। 

केदारनाथ धाम के कपाट शीत काल में 6  माह के लिए बंद कर दिए जाते हैं इस दौरान 6 माह तक मंदिर में अखंड जोत जलती रहती है।


मंदिर 6 फुट ऊंचे चबूतरे पर स्थित है जो की 85 फुट ऊँचा और 187 फुट लम्बा है जबकि 80 फुट चौड़ा है, इस मंदिर की दीवारें 12 फुट मोटी हैं जोकि आज भी प्राचीन भवन निर्माण तकनीकी का का नायब नमूना है।

केदारनाथ मंदिर से जुड़ा पांडवों का संबंध 

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जब महाभारत का युद्ध जब समाप्त हुआ तो पांडवों को विजय तो मिली लेकिन वे ब्रह्म हत्या, भ्रात हत्या जैसे पापों के भी भोगी हो गए थे।  ऐसे में जब पांडवों ने भगवान श्रीकृष्ण से इस सम्बन्ध में याचना की, तो कृष्ण ने कहा की महादेव ही  इन पापों से मुक्ति दिला सकते हैं। 

जिसके बाद पांडव भगवान शिव के दर्शनों के लिए निकल पड़े।  लेकिन महादेव पांडवों से नाराज थे वे उन्हें दर्शन नहीं देना चाहते थे जिसके लिए वे जहां जहां पांडव जाते वहां से स्थान परिवर्तन कर देते थे।  अंतत जब पांडव उत्तराखंड पहुंचने तो वहां भी भगवान शिव उन्हें दर्शन नहीं देना चाहते थे और दुर्गम केदार घाटी में जा बसे।  

जब पांडवो को यह जानकारी मिली तो वे भी पीछे पीछे केदार घाटी जा पहुंचे जहां भगवान शिव ने पांडवों को देख कर बैल का रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं में जा मिले। 

परन्तु पांडव भी संकल्पित थे  और यह जान चुके थे कि महादेव उन्हें दर्शन नहीं देना चाहते है।  तब भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दोनों पहाडों पर अपने पैर फैला दिए क्युकी वे जानते थे की भगवान शिव कभी भी उनके पैरों के नीचे से निकालेंगे और हुआ भी ऐसा ही अन्य सब गाय-बैल तो उनके पैरों के नीचे से निकल गए लेकिन शंकरजी रूपी बैल पैर के नीचे से निकलने को तैयार नहीं हुए। 

वे वहां अड़ गए तब भीम ने उनकी पीठ को पकड़ना चाहा लेकिन भोलेनाथ विशालरूप धारण कर धरती में समाने लगे। तब भीम ने बलपूर्वक बैल की त्रिकोणात्मक पीठ का भाग पकड़ कस कर पकड़ लिया। जिसके फलस्वरूप भगवान शंकर पांडवों की भक्ति, दृढ़ संकल्प को देखकर प्रसन्न हो गए और तत्काल दर्शन देकर पांडवों को पापमुक्त कर दिया। यही कारन है की केदानाथ में पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं।


 देवभूमि Uttarakhand में आज भी मौजूद हैं Pandava के ये साक्ष्य 

उत्तराखंड, खासकर केदार घाटी में आज भी ऐसे कहीं प्रमाण आपको देखने के लिए मिल जायेंगे जो पौराणिक कथाओं और आस्था को और भी पुख्ता करते हैं आज हम कुछ ऐसे ही तथ्यों को आपके सामने लाएंगे। 


Bheem Pul (भीम पुल ) -

बद्रीनाथ से 3 किमी दूर तिब्बत की सीमा पर स्थित सीमांत गांव माणा में सरस्वती नदी पर विशालकाय चटानों से बना भीम पुल  के बारे में माना जाता है की जब पांडव स्वर्गरोहणी की यात्रा शुरू की थी तो रास्ते में उफनती सरस्वती नदी थी जिसे पार करने में द्रौपदी जिन्हें पांचाली के नाम से भी जाना जाता है,  असमर्थता महसूस करती है तब भीम ने एक विशालकाय चट्टान को उठा कर इस पुल का निर्माण किया था।  वास्तव में इस पुल को देख कर कोई भी भीम के बल और शरीर की कल्पना कर सकता है। 


Pandava Gufa / Pandava Cave (पांडवा गुफा ) -  

गंगोत्री से 1.5 किमी की दूरी पर एक प्राचीन प्राकृतिक गुफा स्थित है जिसे पांडव गुफा के नाम से जाना जाता है ऐसा माना जाता है कि यह वह स्थान है जहां महाभारत युद्ध समाप्ति के बाद जब पांचों पांडवों ने कैलाश जाते समय यहां विश्राम और तप किया था। इस स्थान तक पहुँचने के लिए गंगोत्री से ट्रेक करना पड़ता है। पांडव गुफा सुंदर और मनोरम है जिसके चारोँ ओर हरे-भरे जंगल हरियाली, पहाड़ी इलाकों और प्राकृतिक सौंदर्य देखने को मिलता है।


पांडवों और कौरवों का गांव kalap village (कलाप गांव) -  

उत्तराखंड के दुर्गम क्षेत्रों में से एक टन्स घाटी में स्थित कलाप गांव अपनी पौराणिक मान्यताओं के लिए जाना जाता है, इस गांव से रामायण और महाभारत का इतिहास जुड़ा हुआ है. जिस वजह से यहां के लोग अभी तक खुद को कौरव और पांडवों का वंशज बताते है। 

 यहां कलाप गांव में कर्ण का प्राचीन मंदिर है और हर 10 साल के अंतराल पर यहां कर्ण महाराज उत्सव मनाया जाता है।  हालाँकि यह गांव बहुत सारे इलाकों से कटा हुआ है जिस कारण यहां आज भी पारम्परिक वेश-भूषा और पारम्परिक खानपान देखने को मिल जाता है।  


बहुपति प्रथा (Polyandry) - 

महाभारत काल के अनुसार माना जाता है की पांच भाई पांडवों की एक ही पत्नी द्रौपदी थी।  लेकिन उत्तराखंड के कहीं इलाकों में ये प्रथा आज भी प्रचलित है बेसक आज इस प्रथा का प्रसार कम हो गया है लेकिन इसके कुछेक उदाहरण आज भी देखने सुनने में आ  जायेंगे।  उत्तरखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र  में मान्यता है की वे पांडवों के वंसज हैं, जौनसार जनजाति के लोगों को पाशि कहां जाता है। जबकि 

बावर क्षेत्र के लोग अपने को दुर्योधन का वंशज मानते हैं। जिनको षाठी कहा जाता है।  यह क्षेत्र आज भी अपनी परम्परा संभाले हुवे हैं जिनमे से एक बहुपति प्रथा भी है।  



Swargarohini  (स्वर्गारोहिणी) - 


हिंदू महाकाव्य महाभारत से जुडी सबसे प्रचलित कथाओं के अनुसार  स्वर्गारोहिणी वही मार्ग या सीढ़ियां थीं जिन पर चढ़ कर पांडव स्वर्ग की और अग्रसर हुवे थे।  किंवदंतियों के अनुसार महाकाव्य के समाप्त होने के बाद पांडव अपना राज्य छोड़ देते हैं और बह्रम हत्या ,भ्रात हत्या जैसे पापों से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव के आशीष और स्वर्ग तक पहुंचने की आशा में उत्तर की ओर यात्रा करते हैं हालाँकि माना जाता है की पांडवों में सबसे बड़े युधिष्ठिर ही स्वर्ग तक पहुंचने में सक्षम हुए थे।  

वर्तमान साक्ष्यों के आधार पर यह बद्रीनाथ, माणा और सतोपंथ झील के आगे स्वर्गरोहिणी ग्लेशियर है जहां युधिष्ठिर और कुत्ता (यमराज द्वारा लिया गया रूप) देख सकता है। स्वर्गरोहिणी तक की यात्रा के बारे में माना जाता है कि ये साक्षात स्वर्ग के मार्ग पर चलने के बराबर है।  जिसका वर्णन  महाभारत के 17वे अध्याय, महाप्राथनिका पर्व में भी मिलता है। 


भीमसेन का चूल्हा -

उत्तराखंड के ऊखीमठ ब्लॉक के केदारनाथ अंचल की कालीमठ घाटी के कालीशिला मार्ग पर रमणीक गांव ब्यूंखी में भीम का यह विशालकाय चूल्हा स्थित है। मान्यता है कि पांडवों के वनवास के समय उनका खाना 2 अति विशाल पत्थरों से निर्मित इस चूल्हे में बनाया जाता था। इसका निर्माण महाबली भीमसेन ने किया था जिसकी वजह से ही इसे भीमसेन का चूल्हा कहा जाता है। 



पांडव लीला / पांडव नृत्य (Pandav Lila / Pandav dance ) - 


उत्तराखंड की संस्कृति का अभिन्न अंग माने जाने वाले इस पौराणिक नृत्य, पांडव नृत्य का सम्बन्ध सीधे तौर पर पांडवों से है जिसमे पांडवों के जीवन के बारे में दर्शाया जाता है। पांडव भाइयों का रूप धारण करने वाले सभी कलाकार ढोल-दमऊ, पहाड़ी वाद्ययंत्रों की थाप पर नृत्य करते हैं। मान्यता है कि पांडव लीला करते समय, पांडवों की देवीय ऊर्जा कलाकारों के शरीर में प्रवेश करती है और सभी भक्तों में सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार कर आशीष देते हैं।  

दोस्तों ये थे पांडवों से जुड़े कुछ तथ्य जो की उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में आज भी पांडवों से जुडी मान्यताएं और आस्था का प्रमाण देती हैं। 


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